Nikhil

एक और मैं

यूँ ठहर गया कोई दिल में
एक रोशनी हो गई महफ़िल में
चुपके-चुपके कोई पुकारे
दिल पड़ा है किस मुश्किल में

निगाह बाहर को देखे है
रूप कहीं रंग निहारे है
मीठी सी आवाज़ वो देकर
अपनी तरफ़ पुकारे है

अंग तलब करे जग की
नैन रंग को भागे हैं
फिर और क्या है मुझमें
जो तेरी याद संभाले है

तू बोले कहीं कुछ भी
यहाँ कोई सब सुनता है
तेरा नाम ले जागता है
तेरी चुप पर झूमता है

मैं मतवाला हूँ गर जग का
कौन तुझे फिर सुनता है
मेरे अंग-संग मेरे सिवा
एक और मैं भी घूमता है